रमेश–सुरेश की कहानी सिर्फ 35 लाख के कर्ज की नहीं, जिम्मेदारी, भरोसे और अदृश्य सहारे की कहानी है। यह उस भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार की दास्तान है, जहाँ एक मेडिकल इमर्जेंसी न सिर्फ बैंक बैलेंस, बल्कि दिल और दिमाग को भी हिला देती है।
पिता की आख़िरी लड़ाई
आजमगढ़ के एक छोटे से गाँव से निकले रमेश और सुरेश, ठाणे के पास भिवंडी में अपनी ज़िंदगी बना रहे थे, जब दिसंबर 2025 में उनके पिता कैंसर से हार गए। पिता के जाने के साथ ही वे सिर्फ बेटे नहीं रहे, एक पल में घर के मुखिया, निर्णयकर्ता और भावनात्मक सहारा भी बन गए।[youtube]
- परिवार में अब माँ, बड़ा बेटा रमेश (29) और छोटा बेटा सुरेश (25) ही बचे हैं।[youtube]
- पिता के पास न हेल्थ इंश्योरेंस था, न कोई तैयार फंड; इलाज के लिए रिश्तेदारों, दोस्तों और बिज़नेस पार्टनर से लगभग ₹35 लाख उधार लेना पड़ा।[youtube]
पिता ने बेटे के 8–9 लाख के निवेश को छुआ तक नहीं, उल्टा उसे बचाने की हद तक ज़िद की कि “ये तुम्हारा भविष्य है, इसे आखिरी समय के लिए संभाल कर रखो।” यह ज़िद बाद में बेटों के लिए एक अदृश्य सुरक्षा कवच साबित होती है।[youtube]
दो भाइयों की जिम्मेदारी
रमेश आर्किटेक्ट है, मुंबई की एक फर्म में लगभग ₹43,200 महीने कमाता है, जिसमें से 10% TDS कटता है, फिर भी घर का पूरा ढांचा उसी की सैलरी पर टिका है। दूसरी तरफ सुरेश ने ग्रेजुएशन के तुरंत बाद करियर नहीं चुना, बल्कि पिता की देखभाल और टेक्सटाइल बिज़नेस संभालने के लिए अपना एक साल रोक दिया।[youtube]
- रमेश ने अपने खर्चों को बड़ी कड़ाई से मैनेज किया: ₹8,000 रेंट+मेंटेनेंस, ₹2,000 यूटिलिटीज, ₹3,000 ट्रैवल, ₹2,000 पर्सनल खर्च, ₹2,000 टर्म+हेल्थ इंश्योरेंस, ₹1,000 SIP, ₹5,000 इमरजेंसी फंड, और ₹10,000 घर के खर्चों के लिए।[youtube]
- पिता के खरीदे कल्याण वाले फ्लैट से उन्हें लगभग ₹15,000 किराया मिलता है, जो पहले पिता के इलाज और घर के स्थायी खर्च उठाता था।[youtube]
- भिवंडी के टेक्सटाइल यूनिट से लगभग ₹25,000 महीना प्रॉफिट बनता है, जिसमें से सुरेश अपने खर्च और ₹5,500 की SIP निकालता है।[youtube]
ये नंबर ठंडी गणित लग सकते हैं, लेकिन इनके बीच एक परिवार की सांसें चल रही हैं। इमरजेंसी फंड, SIP, इंश्योरेंस – ये सब रमेश के भीतर के उस डर से निकले हैं जो उसने पिता की बीमारी के दौरान अपनी आंखों से देखा।[youtube]
वित्तीय प्लानर का सहारा
इस पूरी भावनात्मक आंधी के बीच वे एक ऐसे व्यक्ति तक पहुँचते हैं, जो खुद को फाइनेंशियल एक्सपर्ट नहीं, बस अनुभव से सीखने वाला कहता है, लेकिन उनके लिए वह एक तरह का मार्गदर्शक बन जाता है। वह उनकी कहानी सुनने से शुरू करता है, नंबर बाद में पूछता है – पहले इंसान, फिर एक्सेल शीट।[youtube]
फिर वह स्थिति को तीन हिस्सों में तोड़ता है:
- कुल कर्ज़: लगभग ₹35 लाख, जिसमें से ₹25 लाख बुआ से, बाकी लगभग ₹10 लाख अलग-अलग रिश्तेदारों व पार्टनर्स से।[youtube]
- मौजूद एसेट्स: रमेश के लगभग ₹9 लाख के शेयर्स/इक्विटी कॉर्पस, उसके लगभग ₹2 लाख के म्यूचुअल फंड्स, और सुरेश के लगभग ₹3 लाख के म्यूचुअल फंड्स – कुल लगभग ₹14 लाख।[youtube]
- प्रॉपर्टी: कल्याण वाला फ्लैट, जिसकी अनुमानित वैल्यू करीब ₹45 लाख और उस पर कोई लोन नहीं।[youtube]
फाइनेंशियल प्लानर की मुख्य सलाह भावनाओं और गणित के बीच पुल बनाती है:
- छोटे–छोटे लोन पहले
- लगभग ₹10 लाख के छोटे कर्ज़ों को तुरंत चुकाने के लिए वह सुझाव देता है कि चाहें तो कुछ निवेश लिक्विडेट करके बाकी रिश्तेदारों व दोस्तों के पैसे वापस कर दें, ताकि भावनात्मक बोझ हल्का हो सके।[youtube]
- बुआ के ₹25 लाख के लिए घर पर लोन
- कल्याण वाली प्रॉपर्टी को माँ या बेटों के नाम ट्रांसफर करवाकर उसके खिलाफ लगभग ₹30 लाख का लोन अगेंस्ट प्रॉपर्टी लेने की बात आती है, 9.5% ब्याज और 20 साल की अवधि मानकर।[youtube]
- लगभग ₹28,000 की EMI उनके कुल कैशफ्लो (सैलरी ₹43,200, किराया ₹15,000, टेक्सटाइल प्रॉफिट ₹25,000 – कुल लगभग ₹83,000) और ₹52–53,000 के खर्चों के बीच आराम से समा जाती है; लगभग ₹30,000 बचे हुए से यह EMI कवर हो सकती है।[youtube]
- निवेश को बढ़ने देना
- वह साफ कहता है कि जो इक्विटी और म्यूचुअल फंड्स 12–13% औसत रिटर्न दे सकते हैं, उन्हें तोड़कर कर्ज़ चुकाना बुद्धिमानी नहीं होगी, जब बैंक से 9.5% पर लोन मिल रहा है।[youtube]
- यानी पैसा वहीं रखा जाए जहाँ वह कंपाउंड होकर तेज़ी से बढ़े, और कर्ज़ वहाँ से लिया जाए जहाँ ब्याज अपेक्षाकृत कम हो – यही असली खेल है।[youtube]
यह सिर्फ प्लान नहीं, भरोसा है – कि अगर वे अनुशासन से चलेंगे, तो कर्ज़ चुकता होगा, और भविष्य भी सुरक्षित बनेगा। फाइनेंशियल प्लानर यहाँ सिर्फ नंबर नहीं जोड़ता, वह दो भाइयों के भीतर छिपे डर को भाषा देता है और उस पर काम की स्ट्रेटेजी बनाता है।[youtube]
आध्यात्मिक सहारा और अदृश्य गणित
कहानी सिर्फ EMI और SIP की नहीं, उस आध्यात्मिक सहारे की भी है जो बिना नाम लिए हर फ्रेम में दिखता है। पिता बीमारी में भी बेटे के निवेश को बचाए रखने पर अड़े रहे – मानो उन्हें पता था कि जाने के बाद उनका यही निर्णय बेटों के लिए कवच बनेगा।[youtube]
इस कहानी में आध्यात्मिकता तीन जगह दिखाई देती है:
- स्वीकार और कर्तव्य
- सुरेश जब अपने साथियों को नौकरियाँ करते, फोन और गाड़ियाँ खरीदते देखता है, तब भी वह घर पर रहकर पिता की सेवा करता है; यह निर्णय सांसारिक गणित से नुकसान वाला, लेकिन आत्मिक दृष्टि से गहन कर्तव्य का भाव है।[youtube]
- फाइनेंशियल प्लानर भी इसे बहुत बड़ा “बलिदान” कहकर सम्मान देता है, जिससे सुरेश को अपने फैसले पर एक शांति मिलती है।[youtube]
- भरोसा बनाम डर
- रमेश का दर्द साफ है: उसे डर है कि कहीं जिन लोगों ने उसके लिए अपनी जरूरत के वक्त पैसा दिया, उनकी ज़रूरत के समय वह पीछे न रह जाए।[youtube]
- आध्यात्मिक दृष्टि से यह अपराधबोध नहीं, कृतज्ञता है; फाइनेंशियल योजना उसे दिखाती है कि सही स्ट्रक्चर बनाकर वह धीरे–धीरे सभी को सम्मानपूर्वक लौटा सकता है, बिना खुद को तोड़े।[youtube]
- नियति और नियंत्रण का संतुलन
यहीं आध्यात्मिकता और फाइनेंशियल प्लानिंग मिलती हैं: जो बदल नहीं सकता उसे स्वीकार करना, और जो बदला जा सकता है उस पर पूरी ऊर्जा से काम करना।
भविष्य की राह: करियर, कंटेंट और विश्वास
पैसे और कर्ज़ की बात के बाद अगला बड़ा सवाल आता है – सुरेश क्या करे? टेक्सटाइल बिज़नेस, फार्मेसी में मास्टर्स या कंटेंट क्रिएशन? फाइनेंशियल प्लानर यहाँ सिर्फ पैसा नहीं देखता, क्षमता और अर्थ भी देखता है।[youtube]
- टेक्सटाइल यूनिट लगभग ₹25–30,000 का प्रॉफिट दे सकता है, और भविष्य में शायद ₹40–50,000 तक पहुंच पाए; इसे स्केल करने के लिए भारी कैपिटल और रिस्क चाहिए, जो फिलहाल परिवार के लिए भारी होगा।[youtube]
- फार्मेसी में मास्टर्स सुरेश को एक मजबूत, प्रफेशनल पहचान देगा, जो लंबी अवधि में स्थिर इनकम और सम्मान दोनों दे सकता है।[youtube]
- कंटेंट क्रिएशन को वह एक साइड एक्टिविटी के रूप में रखता है: हफ्ते में एक दिन फोकस्ड काम, बाकी छह दिन पढ़ाई और करियर, ताकि ग्लैमर के पीछे भागकर वास्तविक कौशल से समझौता न हो।[youtube]
यहाँ भी आध्यात्मिक पहलू छुपा है – अपने भीतर के बुलावे को नज़रअंदाज़ किए बिना, जमीन पर खड़े रहना। कंटेंट से मिलने वाली पहचान की जगह वह सीख और सेवा पर ज़ोर देता है: अगर एक भी इंसान बदलता है, तो कंटेंट सार्थक है, भले व्यू कम हों।[youtube]
अंत में, यह कहानी बताती है कि:
- सही समय पर लिया गया लोन विनाश नहीं, सुरक्षा कवच भी बन सकता है, अगर उसके पीछे सोची–समझी योजना हो।[youtube]
- एक संवेदनशील फाइनेंशियल प्लानर, सिर्फ एक्सेल शीट नहीं, इंसानी दुख, अपराधबोध और उम्मीद को भी स्पेस देता है, और वही असली प्लानिंग है।[youtube]
- और सबसे ऊपर, जब परिवार के भीतर भरोसा, त्याग और आध्यात्मिक दृढ़ता हो, तो 35 लाख का कर्ज़ भी सिर्फ एक फिगर रह जाता है, न कि चरित्र की परिभाषा।[youtube]









