हिमाचल की महिलाओं ने बलि को लेकर किया सवाल Shri Devkinandan Thakur Ji

हिमाचल की देवभूमि में आज जो सवाल उठा है, वह केवल कुछ पशुओं की बलि का नहीं, पूरे समाज की आत्मा का सवाल है। यह लेख इसी प्रश्न का उत्तर है कि क्यों बलि‑प्रथा छोड़ना ही सच्चा धर्म, सच्ची भक्ति और सच्ची मानवता है।


धर्म का असली स्वरूप

सनातन धर्म का मूल संदेश है – दया, करुणा और अहिंसा। हमारे शास्त्र बार‑बार कहते हैं कि भगवान भाव के भूखे हैं, खून के नहीं।

  • श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने स्पष्ट कहा कि सनातन में बलि का अर्थ जीव‑हत्या नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक समर्पण है।
  • जहाँ‑जहाँ सच में जीव‑हत्या हो रही है, वह या तो परंपरा की गलत व्याख्या है या अज्ञान, धर्म का सच्चा निर्देश नहीं।

जब कोई माँ, बहन या बेटी किसी संत से पूछती है – “भगवान के नाम पर बेकसूर जानवर का गला कैसे काट दें?” – तो वास्तव में वह धर्म को उसके असली रूप में याद दिला रही होती है।


बलि‑प्रथा की तीन बड़ी भूलें

बलि‑प्रथा के पीछे अक्सर तीन तरह के भ्रम काम करते हैं –

  1. यह भगवान की इच्छा है
  2. इससे मनोकामना पूरी होगी
  3. यह हमारी संस्कृति है

इन तीनों को थोड़ा गहराई से समझें।

1. “भगवान खुश होंगे” – यह भ्रम

  • जो भगवान समस्त चर‑अचर का पालनहार है, वही अपनी ही सृष्टि के खून से प्रसन्न हो जाए, यह बात बुद्धि और भक्ति दोनों के विरुद्ध है।
  • श्री ठाकुर जी बताते हैं कि कई मंदिरों में पशु की जगह नारियल, फल, कद्दू आदि चढ़ाकर ही “बलि” दी जाती है, और पूजा पूर्ण मानी जाती है; इससे स्पष्ट है कि भगवान को हत्या नहीं, भाव चाहिए।

2. “मनोकामना पूरी होगी” – यह सौदा नहीं

  • अगर किसी की बीमारी ठीक हो जाए या कोर्ट का केस जीत जाए, तो लोग तुरंत बलि देने की प्रतिज्ञा कर लेते हैं; यह भक्ति नहीं, लेन‑देन है।
  • सच्ची श्रद्धा यह है कि मनोकामना पूरी हो या न हो, भगवान के सामने सिर झुके, पर किसी निर्दोष प्राणी की जान न ली जाए।

3. “यह हमारी संस्कृति है” – यह अधूरा सच

  • हिमाचल जैसे क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही बलि‑प्रथा को कुछ लोग अपनी पहचान मानते हैं, लेकिन समय‑समय पर वहीं की देवियों और देवताओं ने भी हिंसा रोकने के संकेत दिए हैं।
  • हिमाचल हाईकोर्ट ने भी मंदिरों में बलि पर रोक लगाते हुए इसे “घृणित और क्रूर” कहा; यह निर्णय भी इसी बात का संकेत है कि समाज की सामूहिक चेतना अब हिंसा से आगे बढ़ना चाहती है।

शास्त्र की सही समझ: प्रतीक, हत्या नहीं

कई लोग कहेंगे, “शास्त्रों में तो बलि का उल्लेख है।” इसके पीछे भी गहरी प्रतीकात्मक भाषा है, जिसे समझे बिना केवल बाहरी रूप पकड़ लिया गया।

  • कई पुराणों और तांत्रिक परंपराओं में “पशु” शब्द अंदर बैठे पशु‑वृत्तियों – काम, क्रोध, लोभ आदि – के लिए प्रयोग हुआ है; उनका “वध” करने का अर्थ अपनी बुरी आदतों को काट फेंकना है, किसी बकरे का गला नहीं।
  • श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने बताया कि कई प्रसिद्ध मंदिरों में आज भी प्रतीकात्मक बलि होती है – जानवर को मारा नहीं जाता, उसे सिंदूर लगाकर छोड़ दिया जाता है; नारियल, फल आदि पर सिंदूर चढ़ाकर ही बलि मानी जाती है।[

अगर सचमुच भगवान को खून ही चाहिए होता, तो इतने विश्व‑प्रसिद्ध वैष्णव, शैव और देवी मंदिर कैसे बिना किसी पशु‑बलि के ही करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र बने रहते।


हिमाचल की देवभूमि और बदलती चेतना

हिमाचल को देवभूमि कहा जाता है; यहाँ की घाटियाँ देवताओं, देवियों और लोक‑देवताओं की कथाओं से भरी हैं। ऐसे पवित्र प्रदेश में जब महिलाएँ खुद खड़ी होकर बलि‑प्रथा पर प्रश्न उठाती हैं, तो यह केवल एक सवाल नहीं, युग‑परिवर्तन का संकेत है।

  • कई देवस्थानों ने अदालत के निर्णय और सामाजिक दबाव के बाद पशु‑बलि रोककर अब केवल प्रतीकात्मक या शाकाहारी प्रसाद स्वीकार करना शुरू किया है।
  • स्थानीय प्रशासन और जागरूक नागरिक “live and let live” – “जीओ और जीने दो” – का संदेश लेकर आगे आ रहे हैं, ताकि पर्व और मेले श्रद्धा, संगीत और सेवा से याद किए जाएँ, खून की धारों से नहीं।

जब देवताओं की धरती पर ही पशु‑हत्या बंद हो सकती है, तो देश‑दुनिया की हर परंपरा में यह परिवर्तन संभव है।


महिलाओं की आवाज़: करुणा की क्रांति

जो वीडियो आपने भेजा, उसमें हिमाचल की कुछ महिलाओं ने खुलकर संत के सामने बलि पर सवाल उठाया। यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं, यह संवेदना की क्रांति है।

  • जो स्त्री जन्म देती है, दूध पिलाती है, हर जीवन को बचाने की सहज भावना रखती है, उसके लिए किसी मासूम की गर्दन पर छुरी चलना भीतर तक चुभने वाली बात है।
  • जब वही स्त्री अपने गाँव, अपने देवी‑देवता, अपने मेले में परिवर्तन की मांग करती है, तो यह समझना होगा कि समाज की अंतरात्मा अब हिंसा को स्वीकार नहीं कर रही।

इसी आवाज़ को, इसी पीड़ा को शब्द देने के लिए यह लेख लिखा जा रहा है, ताकि हर पाठक अपने घर‑परिवार में इस चर्चा को आगे बढ़ाए।


बलि के पाँच अदृश्य घाव

पशु‑हत्या केवल एक जानवर की मौत नहीं, यह पाँच स्तरों पर समाज को घायल करती है।

  1. बच्चों के मन पर घाव
    • मेले या त्योहार के नाम पर जब बच्चे अपने सामने जानवर को तड़पते देखते हैं, तो उनके अंदर या तो भय पैदा होता है, या हिंसा सामान्य लगने लगती है।
    • जो समाज बचपन से करुणा सिखाए, वही संवेदनशील नागरिक देता है; जो बचपन से खून दिखाए, वहाँ कठोरता और क्रूरता बढ़ती है।
  2. धर्म की छवि पर चोट
    • जब सोशल मीडिया पर मंदिरों के बाहर बहता खून, कटते सिर और डरे हुए जानवरों के वीडियो वायरल होते हैं, तो बड़ी संख्या में युवा धर्म से दूर भागने लगते हैं।
    • कई गैर‑हिंदू भी इसे देखकर सनातन धर्म को हिंसक मान लेते हैं, जबकि वास्तविक सनातन अहिंसा का प्रवक्ता है; इस गलत छवि की जिम्मेदारी किसकी होगी।
  3. महिलाओं की असहायता
    • घर की महिलाएँ अक्सर बलि‑प्रथा के खिलाफ होती हैं, पर “रिवाज़ है, क्या कर सकते हो” कहकर उन्हें चुप करा दिया जाता है।
    • जब वही महिलाएँ संगठित होकर सवाल उठाती हैं, तो यह केवल पशु के लिए नहीं, अपनी आवाज़ और अधिकार के लिए भी लड़ाई है।
  4. कानून और परंपरा का टकराव
    • हिमाचल हाईकोर्ट जैसे निर्णय स्पष्ट कर चुके हैं कि मंदिरों में पशु‑बलि पर कानूनन प्रतिबंध है; फिर भी कई जगह पुराने ढंग से बलि दी जाती है, जिससे अनावश्यक कानूनी विवाद खड़े होते हैं।
    • धर्म अगर समाज को शांति देने के बजाय अदालतों में घसीटने लगे, तो यह धर्म की गरिमा के विपरीत है।
  5. हिंसा की आदत
    • जो समाज किसी भी रूप में हिंसा को पवित्र मान लेता है, वहाँ इंसानों पर हिंसा रोकना भी कठिन हो जाता है; हिंसा एक बार पवित्र घोषित हो गई तो उसकी सीमा तय करना मुश्किल है।
    • इसके विपरीत, जो समाज कमजोर और मूक प्राणियों की रक्षा करता है, वह स्त्री, बच्चा, बूढ़ा, गरीब – हर कमजोर के साथ खड़ा होता है।

“प्रतीकात्मक बलि” – समाधान की राह

श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने अत्यंत संतुलित तरीका बताया – प्रथा भी बचे, पर हिंसा न रहे।

  • कई स्थानों पर जानवर की जगह नारियल, कद्दू, फल‑फूल या मिठाई की “बलि” दी जाती है; यजमान प्रण लेते हैं कि इतना फल या अन्न बाँटेंगे, उतने लोगों को भोजन कराएँगे।
  • कुछ स्थानों पर पुराने ढंग से लाए गए पशुओं को गले में फूल, माथे पर सिंदूर लगाकर मुक्त कर दिया जाता है; इसे ही देवी या देवता की प्रसन्नता माना जाता है।

इससे होता क्या है?

  • देवता का सारा उत्सव, डोल, नगाड़े, नृत्य, झाँकियाँ – सब पूर्ववत चलते हैं; केवल हत्या की जगह करुणा आ जाती है।
  • बच्चों के सामने बलि की जगह प्रसाद, कीर्तन और भंडारे की स्मृतियाँ बनती हैं; यही स्मृतियाँ आगे धर्म से जोड़ती हैं, दूर नहीं करतीं।

भावनाओं को ठेस नहीं, ऊँचाई दें

अक्सर जो लोग बलि‑प्रथा से जुड़े हैं, वे बुरे इंसान नहीं होते; वे अपने‑अपने देवता के प्रति अत्यधिक श्रद्धावान और समर्पित होते हैं। बात केवल इतनी है कि श्रद्धा की दिशा थोड़ी बदलनी है – खून से सेवा की तरफ, हत्या से दान की तरफ।

  • किसी से यह कहना कि “तुम्हारे पूर्वज गलत थे” सही तरीका नहीं; सही तरीका यह है कि “आपके पूर्वजों ने अपने समय में जो समझा, वह किया, अब समय और समझ दोनों आगे बढ़ गए हैं, तो हम प्रथा को और श्रेष्ठ बना सकते हैं।”
  • जब किसी गाँव की पंचायत, मंदिर‑समिति या देवता के कारदार खुद घोषणा करते हैं कि अब से केवल प्रतीकात्मक बलि होगी, तो किसी की भावना को चोट भी नहीं पहुँचती और जीव‑हिंसा भी रुक जाती है।

धर्म का अर्थ ही है – जो सबको ऊपर उठाए, किसी को गिराए नहीं; न श्रद्धालु को, न निष्ठावान पुरानी पीढ़ी को, न मूक पशु को।


आप व्यक्तिगत रूप से क्या कर सकते हैं

जो व्यक्ति या परिवार इस लेख को पढ़ रहा है, उसके सामने भी कई व्यावहारिक सवाल होंगे – “हम अकेले क्या बदल सकते हैं?”, “गाँव में लोग मानेंगे कैसे?” आदि। कुछ सरल, शांत और प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।

  • घर से शुरुआत करें
    • अपने बच्चों को समझाएँ कि भगवान जीवन देता है, लेता नहीं; उन्हें पशु‑प्रेम, पक्षियों को दाना, गौशाला सेवा जैसी गतिविधियों से जोड़ें।
    • परिवार में प्रण लें कि किसी भी मनोकामना के लिए किसी प्राणी की जान नहीं लेंगे, केवल प्रसाद, दान और सेवा करेंगे।
  • गाँव और मंदिर‑समिति से संवाद
    • बलि वाले मेलों से पहले गाँव के बुजुर्गों, पुजारी जी, कारदार, पंचायत के लोगों के साथ बैठकर शांत स्वरों में बात रखें, झगड़ालू ढंग से नहीं।
    • देश‑विदेश के उन मंदिरों के उदाहरण दें जहाँ लाखों भक्त आते हैं, पर किसी तरह की पशु‑बलि नहीं होती; फिर भी देवता की महिमा कम नहीं हुई।
  • वैकल्पिक संकल्प सुझाएँ
    • “अगर मनोकामना पूरी हो जाए तो इतने पौधे लगाए जाएँगे, इतने गरीब बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया जाएगा, इतने लोगों को भोजन कराया जाएगा।” जैसे संकल्प रखें।
    • मंदिर‑समिति से निवेदन करें कि यदि कोई पशु बलि के लिए आए तो उसे सजाकर, तिलक लगाकर मुक्त कर दिया जाए, और उसकी देखभाल के लिए गाँव सामूहिक रूप से जिम्मेदारी ले।
  • कानून और जागरूकता
    • लोगों को शांति से बताएं कि अदालतें भी अब पशु‑बलि को रोकने की दिशा में हैं; यदि अभी से समाज स्वयं बदल जाएगा, तो कल किसी को जबरन रोकने की नौबत नहीं आएगी।

छोटा‑सा कदम भी जब सामूहिक रूप लेता है, तो परंपराएँ बदलती हैं; हर बड़े परिवर्तन की शुरुआत किसी एक घर, एक माँ, एक परिवार से ही होती है।


सच्ची बलि: अपनी बुराइयों की

अंत में, बलि‑प्रथा छोड़ने का अर्थ केवल इतना नहीं कि जानवर न मारे जाएँ; इसका अर्थ है कि असली बलि अब अपनी बुराइयों, दोषों और पापों की दी जाए।

  • काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर – इन्हीं “पशु‑वृत्तियों” का वध ही असली यज्ञ है; जो व्यक्ति इन्हें काट दे, वही सच्चा साधक है।
  • जो हाथ पहले छुरी उठाते थे, वे अगर अब किसी भूखे को रोटी देने के लिए उठें, किसी घायल जानवर की सेवा के लिए उठें, तो वही हाथ भगवान की पूजा बन जाते हैं।

हिमाचल की उन बहनों की आवाज़, जिन्होंने बलि‑प्रथा पर प्रश्न उठाया, आज पूरे देश की आवाज़ बन सकती है – “देवभूमि में अब खून नहीं, करुणा बहेगी।”

यही लेख का संदेश है: भगवान के लिए किसी का खून नहीं चाहिए; अगर कुछ चढ़ाना ही है, तो अपनी बुराइयाँ चढ़ाइए, अपनी करुणा जगाइए, और आज ही प्रण लीजिए – जीवन भर किसी भी प्राणी की बलि में हिस्सा नहीं लेंगे।

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