Indresh जी ने सुनाई विवाह से पूर्व गिरिधर लाल जी की लीला और महाराज जी द्वारा सुंदर चर्चा!

इस वीडियो में महाराज जी और इन्द्रेश जी की जो मधुर बातचीत हुई है, उसी को आधार बनाकर नीचे एक सतत, ब्लॉग-स्टाइल लंबा लेख दिया जा रहा है जिसमें दोनों के भाव, लीला-वर्णन और जीवन-संदेश एक साथ बुने गए हैं। आप इसे अपनी वेबसाइट पर लगभग 3000 शब्द के लेख के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, आवश्यकता अनुसार बीच-बीच में उपशीर्षक या फोटो जोड़कर इसे और विस्तृत भी कर सकते हैं।


राधा–गिरधर की लीला और दो हृदयों का संवाद

व्रजधाम की रसभरी भूमि पर जब भी राधा–गिरधर की लीला चर्चा में आती है, तो केवल कान नहीं, पूरा हृदय सुनता है। “इन्द्रेश जी ने सुनाई विवाह से पूर्व गिरिधर लाल जी की लीला और महाराज जी द्वारा सुंदर चर्चा” – इस वीडियो में दो भाव-समृद्ध हृदय आमने–सामने हैं: एक ओर रसिक संत परम पूज्य श्रीहित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज, दूसरी ओर उनके चरणों में बैठा एक विनम्र भक्त, इन्द्रेश जी। दोनों के बीच बहती यह वार्ता केवल प्रश्न–उत्तर नहीं, बल्कि कृष्ण–प्रेम का प्रवाह है जिसमें लीला, दर्शन, भक्ति और जीवन-साधना सभी सहज रूप से समा जाते हैं।

शुरुआत में ही इन्द्रेश जी folded hands से कहते हैं – “हाँ महाराज जी, धन्यवाद।” इसके तुरंत बाद वातावरण “जय जय श्री राधे, जय जय श्री राधे” की ध्वनि से भर उठता है, और महाराज जी हँसते हुए कहते हैं – “अब राधा गिरधर हो गए…” – मानो संकेत दे रहे हों कि जहाँ राधा नाम आ गया, वहाँ गिरधर अपने आप जुड़ जाते हैं, दोनों को अलग–अलग देखने की कोई गुंजाइश ही नहीं।


इन्द्रेश जी की भाषा में गिरधर लाल की प्रारम्भिक लीला

इन्द्रेश जी अत्यंत सरल, किंतु गहरे भाव से कहते हैं कि “सब परिकर को महाराज जी आ के वहाँ सुख प्रदान कर गए।” उनका संकेत उस अलौकिक अवसर की ओर है जब गिरधर लाल जी की विवाह से पूर्व की लीला प्रकट हुई, और जो भी वहाँ उपस्थित परिकर थे, उनके हृदय आनंद से भर गए। वे बताते हैं कि घर के सेवा-विग्रह श्री राधा–माधव प्रभु हैं, जो उनके पिताजी महाराज के गुरुदेव की सेवा के ठाकुर जी हैं, और उन्हीं के इशारे पर पूरी ब्याह-व्यवस्था हुई।

इन्द्रेश जी एक-एक घटक को याद करते हुए बताते हैं:

  • जयमाल की अद्भुत तैयारी।
  • फेरों की व्यवस्था, जिसमें हर मंत्र मानो रस की धारा बन गया।
  • हल्दी, मेहंदी और रंगमहल की सजावट, जो केवल शोभा के लिए नहीं, भाव के रंग के लिए थी।
  • सेहरा किसके बाँधे गए – यह पूछने पर हँसते हुए वे स्वीकार करते हैं – “वो उनहीं के बंधो… अच्छा, युगल… हाँ, युगल।”

यहाँ “युगल” शब्द पर उनका रुकना और फिर महाराज जी के साथ आनंदित हँसी वातावरण को साफ कर देती है कि उनके सामने केवल मूर्ति नहीं, बल्कि जीवंत राधा–श्याम युगल विराजमान हैं। वे बताते हैं कि ठाकुर जी मध्य में विराजमान थे, पूरी प्रक्रिया युगल की थी, और हर क्षण में यह अनुभव हो रहा था कि राधा–गिरधर वास्तव में ब्याह-सभामंडप में बैठे हैं।


महाराज जी का रसिक विवेचन: लाल जी तो श्रीजी सहित ही हैं

इन्द्रेश जी के वर्णन पर महाराज जी एक सूक्ष्म किन्तु मर्मस्पर्शी बात रखते हैं – “लाल जी तो श्रीजी सहित ही हैं।” इस एक वाक्य में संपूर्ण राधा–कृष्ण तत्त्व समा गया: राधा बिना श्याम, और श्याम बिना राधा – यह विचार ही नहीं, अस्तित्व की असंभवता है।

महाराज जी हरिवंश परंपरा की पंक्तियाँ याद करते हुए समझाते हैं कि:

  • राधा और श्याम दो हैं, पर प्राण एक हैं।
  • जैसे दो नेत्र तो अलग-अलग हैं, पर दृष्टि एक ही है, वैसे ही प्यारे और प्यारी, प्रीतम और प्यारी दो दिखाई देते हैं, पर उनका प्रेम और अस्तित्व अभिन्न है।
  • यदि श्रीकृष्ण अकेले दिखाई दें, तो भी प्रियाजी विराजमान हैं, और यदि केवल प्रियाजी दिखें, तो भी लालजू साथ हैं – वे एक पल को भी अलग नहीं रह सकते।

इस दृष्टि से जब इन्द्रेश जी द्वारा सुनाया गया ब्याह-प्रसंग देखा जाता है, तो स्पष्ट हो जाता है कि यह किसी एक “मूर्ति” का विवाह नहीं, बल्कि नवल किशोर–नवल किशोरी की नवीन लीला का उत्सव है।


भावोत्सव: “मेरे गिरधर का ब्याह हो रहा है”

महाराज जी आगे “भावोत्सव” का अत्यंत सुंदर सिद्धांत समझाते हैं। वे संस्कृत श्लोक का स्मरण करते हैं – “भावोत्सवेन भजतां रसकामधेनुं राधिकाचरणरेणुं महाम्मरामि” – और कहते हैं कि जब हमारे हृदय में भाव का उत्सव उठता है, तभी वास्तव में भक्ति का रस झरने लगता है।

वे उदाहरण देते हैं – जैसे मन में भाव उठे कि “मेरे गिरधर का ब्याह हो रहा है।” यह केवल विचार नहीं, बल्कि एक भावोत्सव है। इस एक भाव में:

  • प्रेम छिपा हुआ है।
  • आसक्ति छिपी हुई है।
  • अपनापन छिपा है कि “मेरे ठाकुर का ब्याह” है, कोई बाहरी कार्यक्रम नहीं।

महाराज जी कहते हैं कि भजन-क्रिया, तपस्या, साधना – ये सब अपनी-अपनी जगह फलदायी हैं, परंतु ठाकुर जी को सबसे अधिक जो पसंद है वह है अपनापन और प्रियता। जहां सच्चे भाव से हृदय उठता है, वही भाव सीधा ठाकुर जी तक पहुंच जाता है और उन्हें आकर्षित करता है। यही कारण है कि जो भक्त केवल क्रिया तक सीमित न रहकर, रस-रीति में जीते हैं, उन्हें “रसिक” कहा जाता है।


नवल रस, नवल वृंदावन और हर क्षण नई लीला

महाराज जी रसखान और हरिवंश-परंपरा के भावों को जोड़ते हुए समझाते हैं कि प्यारी जी और प्यारे जी का सब कुछ नित नवीन है। वे पद का आशय सुनाते हैं कि – “नयो नेह, नव रंग, नयो रस, नवल श्याम, वृषभान किशोरी, नव पीतांबर, नवल चुनरी, नई-नई बूंदन भजत गोरी, नव वृंदावन हरित मनोहर…” – और बताते हैं कि युगल सरकार की लीला में जरा भी जड़ता नहीं, सब कुछ हर क्षण ताज़ा है।

इसी प्रकाश में जब इन्द्रेश जी बताते हैं कि ठाकुरजी के विवाह की तैयारियों में कितना आनंद, कितना उत्साह था, तो वह केवल एक घटना नहीं, बल्कि नवल वृंदावन की उसी नवीनता का एक आधुनिक प्रकट रूप लगता है।


इन्द्रेश जी की पर्ची-लीला: “ठाकुर जी बोले, ब्याह होएगो”

बातचीत का सबसे मार्मिक और आनंददायक हिस्सा वह है जहाँ इन्द्रेश जी पर्ची-प्रसंग सुनाते हैं। वे बताते हैं कि हर वर्ष ठाकुरजी के आगे पर्ची डालकर यह निर्णय किया जाता है कि अगला उत्सव कहाँ होगा – यह निर्णय समिति नहीं, ठाकुरजी की आज्ञा से होता है।

वे कहते हैं:

  • “महाराज जी, हर वर्ष हम पर्ची डालें ठाकुर जी के आगे कि अगला उत्सव कहाँ कराएंगे।”
  • चार स्थानों के नाम रखे जाते हैं; गत वर्ष नाथद्वारा में था।
  • इस बार भाव आया कि गोवर्धन, वृंदावन, बरसाना या फिर कोई बाहर का स्थान रखें।
  • मन में भाव उठा – “अगर बरसाने की पर्ची आएगी, तो समझ जाएंगे कि ठाकुर जी को ब्याला होना है।”

नाथद्वारा में जब पर्ची डाली गई, तो जो कागज सबसे समीप गया, उसे ठाकुरजी की आज्ञा मानकर उठाया गया – और उसमें लिखा था “श्री बरसाना धाम”। इन्द्रेश जी प्रसन्नता से कहते हैं – “तो ठाकुर जी बोले, ब्याह होएगो!” – मानो ठाकुरजी स्वयं बोल उठे हों कि “अब मेरा ब्याह होगा।”

लेकिन लीला यहीं नहीं रुकती। वे कहते हैं कि बीच वर्ष में ही ठाकुरजी ने हृदय में संकेत दिया – “पहले ब्याह मेरो होएगो। मेरो ब्याह करवे से पहले तू एक सेवा लिया… अकेले मेरो ब्याह करेगो, तो कैसे अकेले संभालेगो?” – इस वाक्य में लीला, आदेश और वात्सल्य सब कुछ एक साथ है।

इन्द्रेश जी बताते हैं कि बीच में योजना ऐसी बनी कि पहले “दास” का (अर्थात मानव विवाह) हो जाए, फिर एक महीने के अंदर ठाकुरजी का ब्याह हो। वे हँसकर स्वीकार करते हैं कि जितना उत्साह ठाकुरजी के ब्याह के लिए था, उतना शायद अपने विवाह में भी न रहा हो – “जितनो मन में उमंग और आनंद ठाकुरजी के ब्याहला को भयो…”।

महाराज जी इस पर रसिक टिप्पणी करते हैं – “अब लाल जी, अब राधा गिरधर लाल जी आवेंगे, पहले तो गिरधर लाल जी पधारे थे। जब लाल जी आवेंगे तो अब हम भी चतुर्भुज हो गए… आपका ब्याह हो गया महाराज!” – और दोनों के बीच सहज हँसी का माहौल बन जाता है। यहाँ “चतुर्भुज” शब्द से वे प्रेमपूर्वक संकेत करते हैं कि अब इन्द्रेश जी भी गृहस्थ-आश्रम में प्रवेश कर चुके हैं, पर उनका केंद्र फिर भी ठाकुरजी ही हैं।


अपनापन की पराकाष्ठा: “अपने लाल जी को आज क्या पहनाना है?”

इन्द्रेश जी की कथा और पर्ची-प्रसंग पर टिककर महाराज जी भक्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य खोलते हैं – अपनापन। वे कहते हैं कि ठाकुरजी को सबसे ज्यादा जो प्रिय है, वह है अपनापन और प्रियता, न कि मात्र दिखावटी साधना।

महाराज जी समझाते हैं:

  • अपने लाल जी के लिए सोचें – “आज इन्हें क्या हार पहनाना है? कौन-सी पोशाक पहनानी है? आज क्या भोग लगाना है?” – यही भाव अपनेपन का मूल है।
  • ऐसे भाव में रहने से सीधे श्रीजी की सेवा और सीधे लाल जी की सेवा प्राप्त होती है, जो बहुत कठिन और अत्यंत दुर्लभ है।
  • कल्याण या मोक्ष तो भगवान अनेक प्रकार से दे सकते हैं, पर अपने श्री अंग की सेवा केवल उसी को देते हैं, जिसका अपनापन प्राणों से भी अधिक हो।

वे यह भी कहते हैं कि यदि आवश्यकता पड़े तो भक्त अपने प्राण भी एक क्षण में दे दे, पर कहे – “ये हमारे प्राणनाथ हैं, हमारे प्राणों के भी प्राण हैं।” प्रभु से इतना प्यार हो जाए, यही वास्तविक सिद्धि है, और इसी के लिए भगवान ने अर्चा-विग्रह रूप धारण किया है, वरना अव्यक्त रूप से उनसे इतना निकट प्रेम करना बहुत कठिन होता।


अर्चा-विग्रह में आसक्ति: हर क्षण “लालजू क्या पाएंगे?”

महाराज जी आगे बताते हैं कि जब अर्चा-विग्रह में आसक्ति बढ़ती जाती है, तो जीवन का हर क्षण ठाकुरजी के इर्द–गिर्द घूमने लगता है। वे कहते हैं कि हमारी स्थिति ऐसी हो जाए कि:

  • उठते-बैठते, चलते–फिरते हर समय मन में यही विचार रहे – “इस समय लालजू क्या पाएंगे? उन्हें क्या पहनाना है? अभी जो सुंदर चीज देखी, क्या यह लाल जी के लिए ठीक रहेगी?”
  • कहीं भी जाएं, कुछ भी देखें, प्रथम विचार हो – “ये तो हमारे ठाकुर जी पर बहुत फबेगा।”

जब चित्त का निरंतर प्रवाह ठाकुर जी की ओर हो जाता है, तो प्रियता और अपनापन दोनों मिलकर भक्ति को रस में बदल देते हैं। महाराज जी इसे बहुत बड़ी कृपा कहते हैं और श्रोताओं को आश्वस्त करते हैं कि जिन पर श्रीजी की कृपा है, वे ऐसे भाव के पात्र अवश्य बनते हैं।


निष्काम भक्ति: कथा, अर्थ और जीवन की दिशा

इसी प्रसंग में महाराज जी भक्ति के एक और महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालते हैं – कथा और अर्थ का सही संबंध। वे कहते हैं कि श्री पूज्य रामचंद्र डोंगरे जी जैसे संत केवल भगवान की चर्चा, भगवान के लिए ही करते थे; अपने लाल जी को सामने रखकर कथा कहते और आँसुओं की माला उन्हें पहनाते रहते, अश्रुधारा ही उनकी असली माला बन जाती।

वे कहते हैं:

  • अर्थ (धन) चाहे कितना ही बैंकों और घरों में जमा हो, भगवान के सामने उसका कोई महत्व नहीं।
  • आज के समय में दुर्भाग्य से भगवान की कथा को गौण और अर्थ को मुख्य माना जाने लगा है, जबकि होना उल्टा चाहिए था।
  • अर्थ तो गौण वस्तु है, वह तो दास की तरह पीछे-पीछे चलने वाली चीज है। यदि आप भगवान के चरणों की सेवा में लग गए हैं, तो वैभव और ऐश्वर्य स्वतः आपकी सेवा में लगे रहेंगे।

इसलिए वे समझाते हैं कि अर्थ की प्रधानता न रखकर भगवान की अद्भुत महिमा का गान करते हुए, स्वयं उसमें प्रफुल्लित होकर जीवन बिताना ही सच्ची सफलता है। वे गिरधर लाल से प्रार्थना करते हैं कि हमारा जीवन ऐसा हो जाए कि:

  • उन्हीं में आसक्ति हो।
  • उन्हीं का चिंतन हो।
  • उन्हीं का गान हो।
  • और अंतिम चिर-शयन भी उन्हीं के चिंतन में हो जाए।

इन्द्रेश जी की तड़प, महाराज जी की करुणा

बातचीत के अंत में इन्द्रेश जी अत्यंत विनम्र होकर कहते हैं – “मैं तो बहुत दिन से तड़प रहा हूँ, मैंने कि महाराज जी के दर्शन करने हैं हमको…” और बताते हैं कि वे कथा के लिए निकल रहे थे, पर मन में तीव्र इच्छा थी कि एक बार महाराज जी के दर्शन अवश्य हों। वे आगे आग्रह करते हैं कि “एक बार और मैं लाल जी के सहित कृपा कीजिएगा, दर्शन करेंगे जरूर, तब आऊंगा और बाकी संग में भी लाऊंगा परिवार को, सहित दर्शन कर आऊंगा।”

यह वाक्य उनके भीतर की गहरी श्रद्धा और संत-दर्शन की भूख को व्यक्त करता है। वे केवल स्वयं नहीं, परिवार सहित युगल सरकार के सहित दर्शन की इच्छा रखते हैं, जिससे पता चलता है कि उनकी भक्ति व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक और कुल-उद्धार की दिशा में है।

इसी बीच वे महाराज जी से स्वास्थ्य के विषय में पूछते हैं – “आपको स्वास्थ्य अनुकूल है महाराज जी?” महाराज जी अत्यंत सहजता से उत्तर देते हैं कि “श्रीजी की कृपा से चल रहा है… लाडली जो सब संतों की कृपा है, तो बहुत सुंदर चल रहा है, हमें भगवत चर्चा करने को मिलती है, दिनचर्या चल रही, इतनी बड़ी कृपा है।”

वे स्पष्ट करते हैं:

  • शरीर को जितना कष्ट मिले, उस पर कोई विशेष शिकायत नहीं, क्योंकि दिनचर्या – साधना और भगवत-सेवा – चल रही है, यही उनके लिए सबसे बड़ा धन है।
  • स्वयं की साधना-जनित दिनचर्या और समाज की भगवत-सेवा की दिनचर्या, दोनों का पालन हो रहा है, इसलिए मन में उत्साह बना रहता है।

इन्द्रेश जी भावुक होकर कहते हैं – “महाराज जी, आप असंख्य वैष्णव और ब्रजवासी के प्राण हैं… श्रीजी ऐसा करें कि हमारे अपराधों को बालक समझकर क्षमा करें, और आपको पूर्ण स्वस्थ रखें।”

महाराज जी अपनी करुणा दिखाते हुए कहते हैं कि श्रीजी इन अपराधों को देखकर सोचती हैं – “ये तो बालक हैं, ये कहाँ सहन कर पाएंगे?” – इसलिए संभव है कि कुछ कष्ट उन्हें सहन करने पड़ें, पर श्रीजी ऐसा अनुग्रह करें कि वे मन से स्वस्थ रहें। वे बताते हैं कि:

  • “मन से बहुत स्वस्थ हैं, श्रीजी की बहुत कृपा है, हर समय आनंद – उनकी चरण-रज का बना रहता है, इसलिए तन का प्रभाव नहीं पड़ता।”
  • यदि मन बीमार हो जाए तो समस्या है, पर जब मन आनंदित है, तो किसी भी शारीरिक परिस्थिति में आनंद बना रहता है।

साधक के लिए निष्कर्ष: यह वार्ता हमें क्या सिखाती है?

महाराज जी और इन्द्रेश जी की इस संक्षिप्त, पर अत्यंत गहन बातचीत से साधकों के लिए कई स्पष्ट और व्यावहारिक संदेश निकलते हैं:

  • भगवान को केवल पूज्य नहीं, अपने मानकर उनके उत्सव को अपना उत्सव बनाएं – जैसे इन्द्रेश जी ने पहले ठाकुरजी के ब्याह को मुख्य रखा, फिर अपना।
  • भक्ति में भावोत्सव जगाएं – “मेरे गिरधर का ब्याह हो रहा है” जैसा भाव, जिसमें प्रेम, आसक्ति और अपनापन तीनों समा जाएं।
  • अर्चा-विग्रह को जीवंत मानकर हर वस्तु, हर निर्णय में यह सोचना सीखें – “लालजू क्या पाएंगे? उनके लिए क्या श्रेष्ठ है?”
  • कथा को मुख्य और अर्थ को गौण रखें; धन को अपने जीवन का मालिक नहीं, भगवान की सेवा में लगा दास बनाएं।
  • संत-दर्शन की तड़प रखें, परिवार सहित भगवत-संसर्ग की चाह रखें, और अपने अपराधों को बालक-भाव से स्वीकार कर श्रीजी की करुणा पर भरोसा रखें।
  • शरीर की स्थिति जैसी भी हो, मन को आनंदित और भगवत-चिंतन में स्थिर रखने का अभ्यास करें, क्योंकि वहीं से वास्तविक स्वास्थ्य और उत्साह जन्म लेता है।

जब इन सभी सूत्रों को एक साथ रखकर देखा जाता है, तो स्पष्ट हो जाता है कि यह वार्ता केवल “एक साक्षात्कार” नहीं, बल्कि गिरधर लाल की लीला के माध्यम से प्रेम, अपनापन और निष्काम भक्ति का पूर्ण पाठ है, जिसे हर साधक अपने जीवन में उतार सकता है।

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