मन ने जीना हराम कर दिया है, क्या करूँ?

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर बहुत सीधे, व्यावहारिक और प्रेम भरे ढंग से दिया है कि “मन ने जीना हराम कर दिया है, क्या करूँ?”
नीचे वही बात लगभग शब्दशः, क्रम से और उनके ही भाव में एक विस्तृत लेख के रूप में रखी जा रही है, बिना किसी अलग व्याख्या या दर्शन जोड़े, बस भाषा को थोड़ा सहज और प्रवाहमय किया गया है ताकि पढ़ने में सुविधा रहे।


मन ने जीना हराम कर दिया – मूल स्थिति

एक युवक विनती करता है – “महाराज जी, मैं बहुत निराश, हताश और हार चुका हूँ, मेरे मन ने मेरा जीना हराम कर दिया है। सब कुछ जानते हुए भी बुरी आदतें नहीं छोड़ पा रहा हूँ, बहुत कोशिश कर ली, अब तो सामर्थ्यहीन हो गया हूँ।”youtube​

महाराज जी इस स्थिति को बहुत सामान्य मानते हैं – मन जब बार‑बार गिरा देता है, पाप‑आचरण कराता है, गंदे दृश्य दिखाता है, गंदी आदतों में फँसाता है, तब साधक को लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता, जीवन बर्बाद हो गया। लेकिन यहीं से इलाज शुरू होता है।youtube​


पहला उपाय: नाम जप शुरू करो

महाराज जी सबसे पहले यही आदेश देते हैं – “नाम जप शुरू करो।”

  • “नाम जप करो, नाम जप में अपार सामर्थ्य है। आप देख लेना, आप ही जीत जाओगे।”
  • “उठते‑बैठते, चलते‑फिरते, हर समय जब हार चुके हो, तो हारे को हरि नाम – आप शुरू करो नाम जप करना।”

महाराज जी बार‑बार “राधा, राधा” नाम का ही आश्रय बताते हैं, कि यह नाम ही मन के विकारों पर विजय दिलाएगा।
वे कहते हैं – “राधा‑राधा‑राधा‑राधा… देखो इस नाम का प्रभाव तुम्हें जिताता है कि नहीं।”

यहाँ उनका भाव साफ है –
जब मन से लड़ते‑लड़ते थक जाओ, अपने बल से जीतना असंभव लगे, तब हार मानकर भागना नहीं, बल्कि हरि नाम का सहारा लेना है।


दूसरा उपाय: गलत भोजन और गलत दृश्य छोड़ो

इसके बाद महाराज जी स्पष्ट रूप से जीवन‑व्यवहार पर बात करते हैं।

  • “आप गलत भोजन छोड़िए, गलत दृश्य देखना छोड़िए।”​
  • “मोबाइल से गलत दृश्य देखते हो, पुराना अभ्यास लग रहा है थोड़ी… पुराना अभ्यास छोड़ो ना भाई, कुछ तो कदम उठाओ, मजबूत कदम उठाओ।”

यहाँ दो मुख्य बातें हैं:

  1. आहार – जो भोजन तमोगुणी, राजोगुणी, अशुद्ध, उग्र, काम‑क्रोध बढ़ाने वाला है, उसे छोड़ना होगा। महाराज जी का संकेत है कि गलत भोजन मन को और उकसाता है।
  2. दृश्य – मोबाइल पर गंदे चित्र, अश्लील दृश्य, उत्तेजक सामग्री – ये सब मन को और नीचे गिराते हैं। इन्हें रोकना ही पड़ेगा।

वे केवल “मत करो” नहीं कहते, बल्कि कहते हैं – “कुछ तो कदम उठाओ, मजबूत कदम उठाओ।”
अर्थात मन जैसा खींचे, वैसा बहना नहीं है; अपने पक्ष में कठोर निर्णय लेने होंगे।


तीसरा उपाय: धीरे‑धीरे अंतराय बनाओ

प्रश्नकर्ता कहता है – “महाराज जी, कुछ दिन ठीक चल पाता हूँ, फिर वही स्थिति आ जाती है।”youtube​

महाराज जी उस पर तुरंत रोक लगाते हैं –
“नहीं, ऐसे नहीं, ऐसे नहीं, फिर तो कैसे जीत पाओगे?”

फिर एक बड़ा व्यावहारिक मार्ग बताते हैं:

  • “धीरे से आप थोड़ा अंतराय बनाइए।”
  • “थोड़ा‑थोड़ा अंतराय बनाइए – तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन, दस दिन, पंद्रह दिन, धीरे‑धीरे अंतराय बनाते रहिए।”

भाव यह:

  • आज अगर हर तीसरे दिन गिरते हो, तो लक्ष्य बनाओ कि अब कम से कम पाँच दिन तक नहीं गिरूँगा।​
  • फिर बढ़ाकर दस दिन, फिर पंद्रह दिन, धीरे‑धीरे अंतराल बढ़ाओ।

महाराज जी कह रहे हैं – एकदम से पूर्णता की जिद मत पकड़ो, पर हार भी मत मानो; बीच में अंतराल बढ़ाना ही वास्तविक प्रगति है।

इसके साथ ही वे पुनः आदेश करते हैं:

  • “नाम जप शुरू कीजिए। थोड़ा हिम्मत कीजिए। तभी आप निकल पाएँगे।”

चौथा खतरा: निराशा और डिप्रेशन

महाराज जी चेतावनी देते हैं कि यदि निराशा में डूबते गए तो मन कहाँ ले जाएगा।

  • “नहीं तो ऐसे निराश हो जाओगे, तो नेगेटिव विचार करके तुम्हें डिप्रेशन में डाल देगा।”
  • “आत्महत्या के लिए प्रेरित करने लगेगा, फिर परेशान हो जाओगे।”

इसलिए वे कहते हैं:

  • “समझ रहे हो न? इसलिए नाम जप करो और हिम्मत रखो। आज नहीं तो कल जीत जाओगे। हिम्मत रखो और नाम जप करो।”

यहाँ उनका सीधा संदेश है:

  • मन को नेगेटिव, आत्म‑निंदात्मक विचारों में जाने मत दो।
  • “मैं तो निकृष्ट हूँ, मैं तो कभी नहीं बदलूँगा” – ये सब विचार खुद ही मन को डिप्रेशन और आत्मघात की तरफ धकेलते हैं।
  • रास्ता है – आशा, हिम्मत और नाम – “आज नहीं तो कल जीतूँगा।”

पाँचवाँ उपाय: शरीर को मजबूत बनाओ – व्यायाम और दौड़

महाराज जी केवल आध्यात्मिक ही नहीं, शारीरिक स्तर पर भी स्पष्ट निर्देश देते हैं।

वे पूछते हैं – “सुबह दौड़ते हो?”

फिर कहते हैं:

  • “यार, थोड़ा तो आप कहा मानो, तब तो चलोगे।”​
  • “15–20 मिनट व्यायाम करो, दंड‑बैठक मारो।”​
  • “दो‑तीन किलोमीटर सुबह उठकर दौड़ो, देखो तुम्हारा दिमाग फ्रेश होता है कि नहीं होता।”

साथ ही:

  • “गंदी बातों से हटो। अब गंदी बातें करते रहोगे और अच्छी बातें करोगे नहीं तो निराश तो होते ही चले जाओगे।”youtube​

यहाँ उनकी दृष्टि यह है कि:

  • सुस्त, आलसी, जड़ शरीर में काम‑वासना जल्दी बैठती है।
  • जब शरीर सक्रिय, स्वस्थ, जागृत होता है तो दिमाग भी हल्का और साफ होता है, और गंदी आदतों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है।

वे एक साफ फ़ॉर्मूला देते हैं:

  • “अगर आप 15–20 मिनट दंड‑बैठक मारें और 3 किलोमीटर रोज दौड़े और मोबाइल से गलत चित्र न देखें, तो फिर आप देखिए, कुछ दिनों में आप ठीक हो जाएँगे।”

छठा बिंदु: हस्तमैथुन और गंदे आचरण पर स्पष्ट चेतावनी

महाराज जी बिना घुमाए सीधे शब्दों में कहते हैं:

  • “अब आप कई‑कई बार करते हो हस्तमैथुन या गंदे आचरण, मोबाइल में गंदा दृश्य देख, तो फिर आप नष्ट ही हो जाओगे, कौन बचा पाएगा?”

फिर वे हस्तमैथुन की विशेष समस्या समझाते हैं:

  • “हस्तमैथुन का ऐसा खेल है कि इसमें दूसरे की जरूरत नहीं होती।”
  • “जैसे जब दूसरे की जरूरत हो तो जब दूसरा मिलेगा तब हम गलत होंगे, लेकिन जब हस्तमैथुन की आदत हो जाती है तो उसमें दूसरे की जरूरत नहीं रहती।”
  • “फिर सुख पता नहीं तो उसे कई‑कई बार करने लगता है और अपना नाश कर लेता है।”

इसलिए वे बार‑बार कहते हैं:

  • “बहुत सुधरने की जरूरत है, नहीं तो जीवन बर्बाद हो जाएगा।”
  • “आप इसे गंदी बात को रोकिए, नहीं तो जीवन बर्बाद हो जाएगा बच्चा, अभी तुम्हारी अवस्था ही क्या है, जीवन बर्बाद हो जाएगा।”

फिर प्रेरणा देते हैं:

  • “थोड़ा संयम से आइए, थोड़ा मजबूत बनिए, आप बन जाओगे मजबूत, चिंता न करो।”

सातवाँ उपाय: नाम जप, काउंटर और प्रयास

फिर महाराज जी नाम जप पर वापस आते हैं और उसे व्यावहारिक बनाते हैं।

  • “नाम जप करो, राधा‑राधा… काउंटर है तुम्हारे पास? हाँ, काउंटर से नाम जप करो।”
  • “और अधिक से अधिक नाम बढ़ाते रहो।”

फिर वे संघर्ष की विधि बताते हैं:

  • “और रोकने की चेष्टा करो, जब हार जाओ तो फिर अगली बार रोकने की चेष्टा करो।”
  • “ऐसे अगर हम रोकने की चेष्टा करेंगे तो एक बार हम जीत जाएँगे।”

फिर मनोबल बढ़ाते हैं:

  • “हम पहले ही हारे बैठे हैं कि हम तो सब तरह से हार गए, तो फिर तो परास्त कर ही देगा।”
  • “नहीं, हम एक बार हार गए, सौ बार हार गए, लेकिन हम 101वीं बार जीतेंगे।”
  • “हमारा प्रयास रहना चाहिए कि हम जीतेंगे, हम जीत जाएँगे।”
  • “हम भगवान के अंश हैं, हम जीत जाएँगे, हमें भगवान ने सामर्थ्य दी है।”

यही उनका मूल संदेश है:

  • हार को अंतिम सत्य मत मानो।
  • हर गिरने के बाद फिर उठो, फिर रोकने की कोशिश करो।
  • नाम जप, संयम, व्यायाम, गलत दृश्य और गलत भोजन का त्याग – इन सब को मिलाकर चलते रहो, तो निश्चित विजय होगी।youtube​

निष्कर्ष: महाराज जी के ही शब्दों में सार

अगर मन ने जीना हराम कर दिया है, बुरी आदतें नहीं छूट रहीं, हस्तमैथुन, अश्लीलता, गंदे विचार, निराशा सबने घेर लिया है, तो महाराज जी का सीधा मार्ग यह है:

  • नाम जप शुरू करो – “हारे को हरि नाम।” उठते‑बैठते, चलते‑फिरते “राधा‑राधा” का जप करो, काउंटर से गिनो, संख्या बढ़ाते रहो।
  • गलत भोजन और गलत दृश्य छोड़ो – मोबाइल पर गंदे चित्र, अश्लीलता, व्यसन, तमोगुणी आहार – इनको त्यागो, नहीं तो सब भजन ढक जाएगा।
  • धीरे‑धीरे अंतराय बढ़ाओ – तीन दिन, पाँच दिन, दस दिन, पंद्रह दिन; गिरने के बीच का गैप बढ़ाते रहो, यही प्रगति है।
  • निराश मत हो – नेगेटिव विचार डिप्रेशन और आत्मघात की ओर ले जाएँगे, “आज नहीं तो कल जीत जाओगे” – यह भाव बनाए रखो।
  • व्यायाम और दौड़ – रोज 15–20 मिनट दंड‑बैठक, 2–3 किलोमीटर दौड़; इससे दिमाग फ्रेश होगा और गंदी बातें अपने आप कम होंगी।youtube​
  • हस्तमैथुन और गंदे आचरण को गंदी बात मानकर रोकने की चेष्टा करो – बार‑बार हारो, फिर भी हर बार नई चेष्टा करो; एक दिन जीत पक्की है, क्योंकि “हम भगवान के अंश हैं, हमें जीतने की सामर्थ्य दी गई है।”

यही महाराज जी का सीधा, साफ, अत्यंत करुणा‑पूर्ण मार्गदर्शन है उस साधक के लिए जिसका मन उसका जीवन खराब कर रहा है।

  1. https://www.youtube.com/watch?v=dU_Yncbqh5U

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