नया इनकम टैक्स कानून 2025–26
- पुराना इनकम टैक्स एक्ट 1961 हटाकर नया Income Tax Act 2025 लाया जा रहा है, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा।
- इसका मकसद टैक्स के नियमों की भाषा को आसान बनाना, पुराने बेकार प्रावधान हटाना और सिस्टम को ज़्यादा सरल व डिजिटल बनाना है।
- टैक्स की दरों और न्यू/ओल्ड टैक्स रिजीम की बेसिक संरचना लगभग पहले जैसी ही रहेगी, बस प्रक्रियाएँ ज़्यादा साफ और कम कॉम्प्लिकेटेड होंगी।
प्री‑फिल्ड ITR और ऑटो‑फिल सिस्टम
- अब ITR फॉर्म में आपकी बहुत‑सी जानकारी पहले से भरी हुई मिलेगी, जैसे सैलरी, बैंक इंटरेस्ट, TDS, कुछ निवेश आदि।
- ये डेटा Annual Information Statement (AIS), Form 26AS, TIS, पैन‑आधार, बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थानों से सीधे जुड़कर आता है, जिससे मैन्युअल एंट्री काफी कम हो जाती है।
- इससे आम आदमी, खासकर सैलरीड क्लास, बिना चार्टर्ड अकाउंटेंट के भी अपना ITR ऑनलाइन आसानी से भर सकता है, क्योंकि ज़्यादातर कॉलम पहले से भरे होंगे, बस चेक करके कन्फर्म करना होगा।
एक्टिव व पैसिव इनकम पर कड़ी नजर
- सरकार अब सिर्फ नौकरी या बिज़नेस की इनकम (एक्टिव) ही नहीं, बल्कि ब्याज, डिविडेंड, किराया, कैपिटल गेन, डिजिटल पेमेंट जैसे पैसिव इनकम सोर्स पर भी खास नजर रखेगी।
- बैंक अकाउंट में आने‑जाने वाले हर बड़े क्रेडिट‑डेबिट, UPI/Paytm जैसे वॉलेट ट्रांजैक्शन, कार्ड खर्च, सिक्योरिटी/म्यूचुअल फंड/ब्रोकर के रिकॉर्ड AIS और 26AS में दिखने लगते हैं।
- अगर आपकी लाइफ‑स्टाइल या खर्च (जैसे 18–20 लाख साल का डिजिटल खर्च) आपकी घोषित इनकम से मैच नहीं करता, तो सिस्टम में ये असमानता साफ दिखने लगेगी और केस scrutiny में जा सकता है।
टैक्स चोरी अब क्यों मुश्किल होगी?
- किराये की इनकम: भले ही आप किराया कैश में लें, लेकिन जो किराया दे रहा है वह HRA क्लेम के लिए वही एड्रेस और रकम अपने ITR में दिखाएगा; यह डेटा सिस्टम में मैच होकर आपके पैन से जोड़ा जा सकता है।
- Paytm/UPI/वॉलेट: KYC वाले वॉलेट से किए गए पेमेंट भी बैंक के ज़रिए टैक्स सिस्टम में पहुंचते हैं, जिससे छोटे‑छोटे खर्च जोड़कर साल भर में बड़ा अमाउंट बनता है, और उसका सोर्स पूछे जाने की पूरी संभावना रहती है।
- प्रॉपर्टी और कैपिटल गेन: प्रॉपर्टी खरीद‑फरोख्त, शेयर‑म्यूचुअल फंड आदि में हुए कैपिटल गेन के लिए अब फॉर्म में अलग‑अलग कॉलम हैं, जिसमें कॉस्ट ऑफ एक्विज़िशन, इंप्रूवमेंट आदि डिटेल में भरनी होगी, झूठा खर्च दिखाना पहले से कठिन होगा।
- हाई‑वैल्यू ट्रांजैक्शन: 20 लाख या उससे अधिक के बड़े खरीद, मसलन महंगी गाड़ी, प्रॉपर्टी, भारी कार्ड खर्च आदि पर कंप्यूटर‑एडेड स्क्रूटिनी (CASS) के ज़रिए ऑटोमेटिक फ्लैग लग सकता है और नोटिस आ सकता है अगर ITR ठीक से नहीं भरा।
सैलरीड लोगों के लिए राहत और जिम्मेदारी
- न्यू टैक्स रिजीम को और आकर्षक बनाया गया है, ताकि अधिकतर लोग उसी को अपनाएं; खबरों के अनुसार लगभग 12 लाख तक की सैलरी पर रिबेट/छूट के कारण वास्तविक टैक्स ज़ीरो तक जा सकता है।
- पुराने और नए रिजीम में तुलना करें तो न्यू रिजीम में दरें कम हैं, लेकिन ज़्यादातर डिडक्शन (जैसे 80C, HRA, LTA) सीमित होते हैं; इसलिए हर साल अपनी इनकम और निवेश देखकर रिजीम चुनना ज़रूरी है।
- इन्वेस्टमेंट (LIC, ELSS, PF, NPS, हेल्थ इंश्योरेंस आदि) करने पर आपको अलग‑अलग सेक्शन्स में छूट मिल सकती है, जिससे टैक्स बोझ काफी कम होता है, बस वो सब ITR और AIS में सही तरीके से रिपोर्ट होने चाहिए।
आम करदाता को क्या करना चाहिए?
- अपनी सारी इनकम – सैलरी, फ्रीलांस, किराया, ब्याज, डिविडेंड, कैपिटल गेन, ऑनलाइन कमाई – कुछ भी हो, सबको ITR में साफ‑साफ दिखाइए; अब छुपी हुई इनकम पकड़ में आने की संभावना बहुत ज़्यादा है।
- ITR भरने से पहले AIS, TIS और 26AS डाउनलोड करके चेक कीजिए कि आपकी इनकम और TDS वहीं जैसा दिख रहा है जैसा वास्तव में हुआ; गलती हो तो उसी समय सुधार कीजिए।
- कैश लेन‑देन से जितना हो सके बचिए; बड़ी खरीद और भुगतान हमेशा बैंक/UPI/कार्ड से कीजिए, ताकि बाद में सोर्स और ट्रेल साफ रहे और आपको खुद भी दिक्कत न हो।
- समय पर रिटर्न फाइल कीजिए और अगर नोटिस आए तो इग्नोर न कर के ऑनलाइन पोर्टल पर जवाब दीजिए या जरूरत हो तो किसी रजिस्टर्ड टैक्स प्रोफेशनल की मदद लीजिए।







