इस अनोखे इलाज के बिना दिल्ली NCR का प्रदूषण ख़त्म नहीं हो सकता

हमारे सोसाइटी की चारदीवारी के बाहर कुछ ग्रीन बेल्ट एरिया था, कुछ दिन पहले सोसाइटी की RWA ने उस पर पक्का फुटपाथ बना दिया, जो बड़े पेड़ थे, उनको जरुर छोड़ दिया गया और चारो तरफ जो मिट्टी का एरिया था उसको सौंदर्यीकरण के नाम पर पक्का कर दिया गया.

दरअसल यह एक छोटा सा उदहारण पूरे देश में अधिकाँश लोगों की सोच को जाहिर करता है. कभी लोगो के घर तो कभी बुनियादी सुविधा, परिवहन, व्यवसाय, मनोरंजन, सौंदर्यीकरण के नाम पर बहुत तेजी से भूमि को पक्का किया जा रहा है. ग्रीन एरिया ख़त्म हो रहा है. ग्रीन एरिया को ख़त्म करना विकास कहलाता है.

सोसाइटी में एक कूड़ेवाला अपने गाँव में किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था, वह कह रहा था, अभी अगले महीने घर आऊंगा तो छत पर एक और मंजिल बना दूंगा, किराए पर दे दूंगा. सोसाइटी में एक बगल में ही 43 मंजिल की सोसाइटी बनी है, वहीँ कुछ दूर ही सालों से खाली पड़े बहुत बड़े खुले मैदान पर कई मंजिला मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल बन गया है. जहाँ महंगी मेडिकल फैसिलिटी है. ऐसे ही ना जाने कितने उदहारण है जो ग्रीन एरिया को ख़त्म कर रहे है. विकास कर रहे है.

आज 12 नवम्बर को अखबार पढ़ रहा था तो पता लगा कि दिल्ली एनसीआर में तो इस बार पराली का जलना भी 50 फीसदी कम हुआ है, जबकि पटाखे भी नहीं जल रहे, तो फिर दिल्ली में थोड़ी सर्दी बढ़ने और हवा कम चलने से एकदम प्रदूषण क्यों बढ़ रहा है. ऊपर लिखे उदहारण भी इसके कारण है. आखिर हम क्यों ग्रीन एरिया ख़त्म करने में जुट गए है. इसका एक बड़ा कारण है जो मुझे सबसे बड़ा कारण लगता है. वो है – अध्यात्म

आपको यह कारण बेतुका जरुर लग रहा होगा. वृन्दावन के रसिक संत प्रेमानंद महाराज जी वृन्दावन में वहाँ की पवित्र और पूजनीय लता पता (पेड़, पौधे) को काटने का मुद्दा कई बार उठा चुके है. वो कहते है कि पहले वृन्दवान का परिकर्मा मार्ग बिलकुल कच्चा हुआ करता था, दोनों ओर खूब लता पतायें थी लेकिन अब तो सड़क बनाने के नाम पर सब पक्का कर दिया गया है. चारो तरफ होटल और मकान ही बन रहे हैं. महाराज जी कहते है अब करोडो रुपए की जमीन है तो लता पताओं के लिए जगह छोड़ते नहीं है. आदमी की बुद्धि भ्रष्ट हो रही है.

दरअसल आदमी की बुद्धि भ्रष्ट हो रही है. वहीँ पूज्यपाद राधानाथ दास प्रभु जी अपने सत्संग में कहते है, कलयुग में बुद्धि प्राय: लुप्त हो जाती है, लोग प्राय: मनोमय रहते हैं. मन के आगे विवेक चलता नहीं है, जैसा मन करता है, वैसा खाते, पहनते और आचरण करते हैं.

अब यह विवेक कहाँ से मिलेगा, यह विवेक सत्संग से मिलेगा. लोगों के लिए असल में क्या अच्छा है और क्या बुरा? यह सत्संग से पता चलेगा. भगवान् के परम भक्त संतजन यही ज्ञान लोगों को बता रहे है. लोगो को अध्यात्म सिखा रहे हैं. इससे लोगों में सही समझ विकसित हो रही है.

कुछ समय पहले वृन्दावन के रसिक संत पूज्य प्रेमानंद महाराज जी से किसी ने पूछा कि महाराज जी वृन्दावान में प्लाट (जमीन का टुकड़ा) ख़रीदा है. पर उस पर एक पेड़ लगा है, मैं क्या उसे काट दूं या उसकी थोड़ी छंटाई करा दूं. महाराज जी तुरंत कहा, बिलकुल नहीं भैया, वृन्दावन में रहने का सौभाग्य पेड़ काटने से खत्म हो जाएगा. भक्त महाराज जी की बात तुरंत मान गया. सत्संग का यही असर होता है, इसलिए अध्यात्म ही सब समस्याओं का इलाज है. प्रदूषण खत्म करने के लिए सबसे पहले आदमी की बुद्धि में फंसे प्रदूषण को ख़त्म करना होगा. जो अध्यात्म से ही संभव है.

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