एक भगवान्‌ की उपासना से सबकी उपासना सम्पन्न हो जाती है। (EN)

९४-जैसे वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे सारे पेड़में रस पहुँच जाता है, इसी प्रकार एक भगवान्‌की उपासनासे सबकी उपासना सम्पन्न हो जाती है।

९५-जैसे सरकारकी शक्तिसे, सरकारकी यथायोग्य शक्तिको पाये हुए अफसरोंका यथायोग्य सम्मान और आदेश-पालन सरकारकी ही सेवा है और उसे नियमानुसार करना भी आवश्यक है, वैसे ही भगवान्‌की शक्तिसे नियुक्त विभिन्न देवताओंकी भी यथास्थान पूजा करनी आवश्यक है और उससे वस्तुतः भगवान्‌की ही पूजा होती है।

९६-सच्चा सौन्दर्य मनुष्यके निर्मल और दैवीगुणसम्पन्न हृदयमें है, न कि हड्डी-चमड़ीके शरीरमें।

९७-सच्चे महात्माके दर्शनसे पाप नाश होता ही है; परन्तु यदि दर्शन करनेवाला मनुष्य श्रद्धालु होता है तो उसे प्रत्यक्ष ऐसा अनुभव होता है, मानो उसके पाप सूखी घासकी तरह महात्माकी निर्मल नेत्र- ज्योतिसे ही जले जा रहे हैं।

९८-विश्वासी भक्तको किसी सच्चे महात्माके दर्शन हो जायँ तो उसे ऐसा लगता है मानो भगवान् मिल गये हैं और सचमुच वह ऐसा अनुभव करता है कि दया, प्रेम, शान्ति, वैराग्य, समता, आनन्द, ज्ञान और भगवान्की अखण्ड अनुभूति आदि दैवी गुण दिव्य राज्यसे उतरकर उस महात्माके संकेतसे मेरे अन्दर प्रवेश कर रहे हैं।

९९-भगवान् मुँहमाँगी, कामना नहीं पूरी करते। वे उसी कामनाको पूर्ण करते हैं, जिसमें हमारा कल्याण होता है। वे उस सद्वैद्यके समान हैं, जो रोगीके रोगका निदान करके उसे उचित औषध देता है। वे उस दवाके दूकानदारके समान नहीं हैं, जो पूरी कीमत मिल जानेपर कोई भी दवा खरीदारको दे देता है- चाहे वह उसके लिये हानिकारक है हो।

१००- भक्तके हठ करनेपर यदि कभी कोई ऐसी चीज भगवान है

भी देते हैं तो साथ ही उस स्नेहमयी माँकी तरह रक्षा भी करते हैं, जो बच्चेके हठ करनेपर उसे चाकू दे तो देती है, परन्तु यह ध्यान रखती है कि उसे चोट न लग जाय।

१०१- भगवान्की दी हुई वस्तु असलमें बुरा परिणाम करनेवालो होती ही नहीं; क्योंकि भगवान्के मंगलमय दानमें अमंगलकी गुंजाइश ही नहीं है।

१०२-निरन्तर यह अनुभव करते रहना चाहिये कि भगवान्‌की कृर मेरे ऊपर अनवरत अपार रूपसे बरस रही है। मैं ऊपर-नीचे, आगे पीछे सर्वत्र भगवत्कृपासे सराबोर हूँ। भगवत्कृपामें डूबा हूँ। भगवत्कृपाले अलग होना चाहूँ तो भी नहीं हो सकता।

१०३-ऐसा निश्चय करना चाहिये कि मेरे लिये जो कुछ होता है।

सब भगवान्की आज्ञासे होता है, उनकी देख-रेखमें और उनके मंगल- विधानसे होता है। उनके समान मेरा परम हितैषी आत्मीय दूसरा कोई नहीं है, फिर मैं उनके विधानपर प्रसन्न न होकर मन मैला क्यों करूँ।

१०४-मनसे निरन्तर भगवान्‌के मंगलमय स्वरूपका ध्यान, वाणीसे उनके मंगलमय नाम-गुणका जप-कीर्तन और शरीरसे उनके सर्वभूतस्थित विग्रहकी या किसी एक मंगल-विग्रहकी सेवा करनी चाहिये।

१०५-निरन्तर यह ध्यान रखना चाहिये कि आयु बीत रही है, मृत्युका क्षण समीप आ रहा है। अब बहुत ही थोड़ा समय शेष रह गया है। इस थोड़े-से समयमें ही भगवान्‌का अनन्य भजन करके जीवनको सफल बनाना है।

१०६-संसार जो कुछ है सो सब भगवान् है और संसारमें जो कुछ हो रहा है, सो सब भगवान्की लीला हो रही है। बस, यहाँ लीलामय और लीलाके सिवा और कुछ भी नहीं है।

१०७-गंगाजीमें इसीलिये पापनाशकी शक्ति है कि वे भगवान्‌के पादपद्मसे निकली हैं।

१०८-भक्त इसीलिये सबको पावन करता है कि वह परम पावन भगवान्‌का भजन करता है।

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