पिता और माता आपस में लड़ें तो पुत्र का क्या कर्तव्य है? (EN)

प्रश्न-पिता और माता आपसमें लड़ें तो पुत्रका क्या कर्तव्य है?

उत्तर-

पुत्र का कर्तव्य

जहाँतक बने, पुत्र को माँ क पक्ष लेना चाहिये; परन्तु पिताको इस बातका पता नहीं लगना चाहिये कि यह अपनी माँका पक्ष लेता है। पितासे कहना चाहिये कि ‘पिताजी ! आप हम सबके मालिक हैं। मेरी माँ कुछ भी कहेगी तो आपसे ही कहेगी। आपके सिवाय उसकी सुननेवाला कौन है?

पति का कर्तव्य

पुत्र को पिता को कहना चाहिए कि विवाह के समय आपने अग्नि और ब्राह्मणके सामने जो वचन दिये थे, उसका पालन करना चाहिये। माँ अपने दिये हुए वचन निभाती है या नहीं, इसका खयाल न करके आपको अपना ही कर्तव्य निभाना चाहिये। आप मर्यादा रखेंगे तो मेरे और मेरी माँके लोक-परलोक दोनों सुधर जायँगे, नहीं तो हम दोनों कहाँ जायँगे ? आपके बिना हमारी क्या दशा होगी ? मैं आपको शिक्षा नहीं दे रहा हूँ, केवल याद दिला रहा हूँ। मैं कुछ अनुचित भी कह दूँ तो आपको क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि आप बड़े हैं-

‘क्षमा बड़नको चाहिये, छोटनको उत्पात। कहा विष्णुको घट गयो, जो भृगु मारी लात ॥’ भृगुने लात मारी तो विष्णुभगवान्‌का घटा कुछ नहीं, प्रत्युत महिमा ही बढ़ी ! अतः आप खुद सोचें। आपको मैं क्या समझाऊँ, आप खुद जानकार हैं।’

परिवारमें कलह न हो-इसके लिये प्रत्येक व्यक्तिका कर्तव्य है कि वह अपने अधिकारका त्याग करके दूसरोंके अधिकारकी रक्षा करे। प्रत्येक व्यक्ति अपना आदर और सम्मान चाहता है; अतः दूसरोंको आदर और सम्मान देना चाहिये।

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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