इन पाँच नियमों के सुधार से गर्भस्थ शिशु का बल और बुद्धि दोनों का विकास – श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

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महाराज जी आपने कहा है कि श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि सत्यम, शौचम, दया, दानम और भोजन का सुधार “इन पाँच नियमों के सुधार से गर्भस्थ शिशु का बल और बुद्धि दोनों का विकास होगा?”

श्री महाराज जी:

गर्भधारण में ब्रह्मचर्य से रहो

“हाँ, ठीक बात है। सत्यम, शौचम, दया, दानम और भोजन का सुधार – बिल्कुल ठीक है। लेकिन सत्य क्या है? भगवान। इसलिए भगवान का नाम जप करो।
शौच क्या है? पवित्रता। शरीर की पवित्रता, मन की पवित्रता। जिस दिन से गर्भस्थ शिशु आ जाए, यह पता चल जाए कि हमारा गर्भधारण हो गया, उस दिन से ब्रह्मचर्य से रहो। यह परम पवित्रता है। व्यभिचार न करो, भोग न करो जब तक बालक प्रकट न हो जाए और योग्यता न आ जाए, तब तक ब्रह्मचर्य से रहो। लेकिन ऐसा कौन रह पाता है?
अगर अपने बच्चे को बुद्धिमान, बलवान और भक्त बनाना है या राष्ट्रभक्त बनाना है, तो आपको यह नियम लेना पड़ेगा कि जिस दिन से गर्भ रह जाए, उस दिन से ब्रह्मचर्य चालू कर दें। पति-पत्नी दोनों ब्रह्मचर्य का पोषण करें जब तक वह बालक जन्म न ले ले।
यह शौच – यह पवित्रता के अंतर्गत आएगा।
और दया – सबके प्रति दया का भाव रखें।
और दान – तीर्थ स्नान करें। जब पशु-पक्षी, भूखे, परेशान लोगों को, अगर हमारे पास धन है, हमारे पास सुविधा है, तो हम थोड़ा उनको भी दें और उस पुण्य का फल माँगे कि हमारा बालक स्वस्थ हो, हमारा बालक बुद्धिमान हो, हमारा बालक भगवान का भक्त हो।
और हम स्वयं पवित्र भोजन करें।
तो निश्चित बात है कि उस गर्भस्थ शिशु पर इसका प्रभाव पड़ेगा।महाराज जी ने प्रश्न दिया – एक भुक्तम् तू भोजन – मतलब एक बार भोजन करें, ऐसा भी है।
नहीं, बच्चे के पुष्टता के लिए आयुर्वेद सिद्धांत के अनुसार भोजन करना चाहिए, जो हमारा शरीर स्वस्थता के नियम हैं, उसके अनुसार भोजन।
अब एक बार अगर भोजन करोगे तो बालक दुर्बल नहीं होगा, क्योंकि वह माँ से ही तो पुष्ट होता है।
तो हमें अच्छे पदार्थ पाने हैं, सात्विक पदार्थ पाने हैं, और दो-तीन बार जब भूख लगे, जैसे लगे, उसके अनुसार पाना।
क्योंकि माँ से ही उसका पोषण होता है, बालक का कोई आहार तो है नहीं, उस समय गर्भस्थ शिशु का आहार माँ के ही आहार से जुड़ा हुआ होता है।
तो अगर आप उपवास करोगे, आप व्रत करोगे, आप एक बार पाओगे, तो बालक को कहाँ से पोषण मिलेगा?
बालक को पोषण देने के लिए पौष्टिक आहार पाइए, सात्विक आहार पाइए, और दो बार, तीन बार पाइए।
बाल भोग – थोड़ा पा लीजिए, फिर दोपहर में पा लिया, फिर शाम के पा लिया, थोड़ा-थोड़ा करके पाइए, जिससे बालक का पोषण होता रहे।”

जिसमें महाराज जी ने पाँच नियमों (सत्य, शौच, दया, दान, भोजन का सुधार) के पालन से गर्भस्थ शिशु के बल और बुद्धि के विकास के विषय में विस्तार से बताया ह

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